अक्षर आँचल योजना की हक़ीक़त 02 अक्टूबर 2016 के बाद

अक्षर आँचल योजना की हक़ीक़त 02 अक्टूबर 2016 से पहले जब स्कूल में चलता था बहुत हद तक ठीक कहा जा सकता है मगर 02 अक्टूबर 2016 के बाद महिला साक्षरता केंन्द्र का संचालन विद्यालय से बाहर कर दिया गया यहाँ तक कि बीस बच्चों को भी विद्यालय से बाहर ही ट्यूशन देने का प्रावधान कर टोला सेवक और शिक्षा स्वयं सेवी को पूरी तरह स्कूल से बाहर कर स्थापित व्यवस्था को पूरी तरह तहस नहस कर दिया गया।मौजूदा सरकार की नीतिगत फैसला बिना सोचे समझे और ज़मीनी हक़ीक़त को दरकिनार करते हुए लागू कर दी जाती है जिस का असर स्थापित व्यवस्था पर असर अंदाज़ होता है और जो सफलता मिलनी चाहिए वह सफलता नही मिलती अगर ये कहा जाए कि ज़मीनी हक़ीक़त शून्य हो जाती है तो कोई ग़लत नही होगा।
      मालूम हो कि तालिमी मरकज़ और उत्थान केन्द्र की स्थापना वर्ष 2008 में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय के बच्चों और दलित समाज के बच्चों को(06 से10 आयु वर्ग) मुख्य धारा की शिक्षा देकर वर्ग 3 में विद्यालय में नामांकित करने की ग़र्ज़ से बिहार शिक्षा परियोजना परिषद पटना के वैकल्पिक एवं नवाचारी शिक्षा कार्यक्रमके अन्तर्गत किया गया था जिसको परियोजना परिषद से हटा कर बिहार सरकार ने 10 दिसंबर2012से जन शिक्षा, जन शिक्षा निदेशालय शिक्षा विभाग बिहार पटना के अधीन करते हुए तालिमी मरकज़ शिक्षा स्वयं सेवक और टोला सेवक के ऊपर महिला साक्षरता केन्द्र का अतिरिक्त भार सौंप दिया वहाँ तक तो ठीक था क्योंकि कमज़ोर बच्चों और महिलाओं का उपचारात्मक शिक्षण संबंधित विद्यालयों में ही होता था और ठीक ठाक व्यवस्थित रूप से चल रहा था जिस में स्वयं सेवक और टोला सेवक को कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन 02 अक्टूबर 2016 के बाद स्थापित व्यवस्था को सिरे से नकार दिया गया और बच्चों और महिला का साक्षरता केन्द्र मुहल्लाह में ही किसी के दरवाजे या सामुदायिक भवन में ही चलाने का पत्र निर्गत कर शिक्षा स्वयं सेवक और टोला सेवक को परेशानी में डालते हुए स्थापित व्यवस्था को बर्बाद कर दिया गया
            "" क्योंकि आज किसी भी मुहल्लाह में दरवाज़ा का कॉन्सेप्ट नही है और नही किसी मुहल्लाह मे सामुदायिक भवन ही है। ""

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