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प्रेसर ग्रुप ज़िंदा क़ौम की पहचान होती है

माहेश्वरी साहब ज्वेलर हैं, शहर में इनके समाज की आबादी 0.1 % भी नहीं है मगर चोरी का ज़ेवर खरीदने पर पुलिस कार्रवाई क्या शुरू हुई, शाम तक तमाम अखबारों-चैनलों में दर्जनों अहम् असोसिएशंस के प्रेसनोट आने लगे--पुलिस प्रताड़ना बंद हो, जाँच पहले हो एफआईआर बाद में, ऐसी ऐसी संस्थांएँ जिनके लेटरहेड बड़े इम्प्रेसिव होते हैं, एडिटर्ज़-न्यूज़ एडिटर्स को लगने लगा कि मामला गंभीर है, बड़ा रिएक्शन हो रहा है. दूसरी तरफ एक गरीब आदमी को किसी 'सेना' या 'दल' के  गुंडे ने मार दिया, न डेलिगेशन गए न ढंग के प्रेस नोट, न फोन, न रिएक्शन, कुछ नहीं, सोशल मीडिया पर हंगामा हुआ मगर नेता-समाजसेवी-कार्यकर्ताओं में ज़मीन पर स्टेटमेंट देने कि हम इसे कंडेम करते हैं या गिरफ़्तारी-कम्पेन्सेशन की मांग करते हैं, इतना कहने तक का जोश पैदा न हुआ.
आप का समाज अपने इलाक़े में तीस फीसद है मगर आपने अपना हाल इतना बुरा कर लिया है कि लोगों को महसूस ही नहीं होता कि आप कहीं हैं, आप न बोलते हैं, न नज़र आते हैं, न हिकमत से काम करते हैं. माहेश्वरी साहब के घर में दस सदस्य हैं, सब एक्टिव हैं, एक चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष हैं, दुसरे अपने स्पोर्ट्स बॉडी बनाये हैं, दो लड़के हैं जो युथ क्लब और लायंस क्लब से जुड़े हैं, महिलाएं भी अलग अलग संस्थाओं में पदाधिकारी हैं जिनमें बनिया समाज से ले कर रोज़ (गुलाब) सोसाइटी और सर्वधर्म समाज समिति तक मौजूद हैं. ऐसा ही माहेश्वरी जी के दोस्तों के परिवारों में भी है. ऐसा नहीं है कि ये सारी संस्थाएं एक्टिव हैं या इनकी मीटिंग या प्रोग्राम हर महीने होते हैं. मगर हैं. और ये अहम है. आप इतनी मामूली सी बात नहीं समझ पाते कि जब लेटरहेड पर रिएक्शन होता है तो उसकी क्या वैल्यू होती है. इनमें से एक आध सस्न्था साल में एक आध प्रोग्राम भी करती है, अधिकारीयों, समाजसेवियों, प्रतिभाओं का सम्मान करती है, ताल्लुक़ात बनती है. गरज़ 0.1 % हो कर  वोह ये फीलिंग देने में कामयाब होते हैं कि वोह सबसे वोकल, ताक़तवर और एक्टिव हैं, बेहद कम हो कर भी इम्पैक्ट शहर में पचास फीसद का देते हैं. जिस जिस जगह आप को (भी) होना चाहिए था, आप नहीं हैं, चाहे वोह पहली नज़र में कितनी ही गैर-अहम जगह हो, मगर वहाँ आपको माहेश्वरी साहब रिप्रेजेंट कर रहे हैं. फिर चाहे वोह सराफा असोसिएशन हो या बिजली उपभोक्ता संघ, ट्रांसपोर्ट असोसिएशन या सिटिज़न जागरूकता मंच. कुछ चीज़ें समझने की होती हैं, आप कुछ न हो कर भी सब कुछ हो सकते हैं, ये इम्पैक्ट होता है कि जब इतने प्रेस नॉट आते हैं, स्टेटमेंट आते हैं तो फिर मजबूर हो कर पुलिस-प्रशासन-प्रेस भी कार्रवाई से पहले दस बार सोचता है, और दूसरी तरफ जेनवीन मामले में भी गलत कार्रवाई हो जाती है. यहां आलम ये है एक स्कूल का लड़का किसी मामले में गलत केस में फँस जाता है--गलती उनसे हुई है अधिकारी मानते हैं और इस बारे में खबर भी छप जाती है तो उस पर अखबारों में रिएक्शन या प्रेस नोट नहीं आते, जो अगले दिन फॉलो-अप हो सकें. एक डेलिगेशन बड़े अधिकारीयों या नेताओं के पास जायेगा जायेगा इसकी तैयारी में ही एक हफ्ता निकल जाता है. आप जायेंगे, बोलेंगे, आवाज़ उठाएंगे तब लोगों को लगेगा कि आप संजीदा हैं, उसी पर कमीशंस कॉग्नीज़न्स लेंगे, उसी पर अलग अलग  इदारों की जांचें होंगी. अधिकारी सिर्फ हंगामा, नेगेटिव रिपोर्टिंग या बवाल से घबराते हैं, अगर उनको ऐसा लगता है कि फलां कार्रवाई करने से रिएक्शन होगा तो दस बार सोचते हैं, मगर ऐसा तब होता है  जब कोई समाज ज़िंदा होता है, उसमें सब तरह के ज़िंदा लोग होते हैं, असोसिएशंस होती हैं, एनजीओज़ होती हैं, हर तरह के बोलने और करने वाले लोग. आपको किसी ने एक्टिव होने से नहीं रोका, जो आपको समझ में नही आता आप देख कर सीख सकते हैं, औरों से पूछ सकते है, उनके प्रोग्रामों में शामिल हो सकते हैं, वोह न करें तो अपना दूसरा बैनर बना लें और उसमें सबको शामिल करें, वोह सिटीजन फोरम या चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स में आपको नहीं रखते आप नया पैरलेल ग्रुप बनायें, न्यू सिटी या मेट्रो सिटीजन फोरम के नाम से, मगर कुछ करें तो. स्पेस कैप्चर करना ज़रूरी है मगर आप स्पेस छोड़ते जा रहे हैं और फिर आप ब्लेम करते हैं की मीडिआ तवज्जोह नहीं देता या पॉलिटिशियन सुनते नहीं या ब्यूरोक्रेट आपको अहमियत नहीं देते, भाई कुछ कीजिये तो पहले. कोई भी काम करना है, समाज के लिया अच्छा, स्ट्रेटेजी बनाइये थोड़ी सी और फिर देखिये....

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