ग़ज़ल

बहादुर शाह ज़फ़र
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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी।

जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी।।
ले गया छिन के आज तेरा सब्रो क़रार।
बे क़रारी तुझे ऐ दिल कभी तो न थीं ।।
चश्मे क़ातिल मेरी दुश्मन थीं हमेशा लेकिन।
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी।।
उसकी ऑखो ने खुदा जाने क्या क्या जादू।
के तबीयत मेरी माएल कभी ऐसी तो न थी।।
क्या सबब तु जो बिगड़ता हैं ज़फ़र पर हर बार।
खु तेरी हुर शमाएल कभी ऐसी तो न थी।।
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