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हिन्दी सिनेमा के 65 साल

मेहजबीं

हिन्दी सिनेमा में पिछले 65 सालों में एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में बनी, क्लासिकल, रोमांटिक, कलात्मक, ऐक्शन, कमर्शल, डॉक्यूमेंट्री, टेली फिल्म, सभी मशहूर- ओ - माअरूफ़ नहीं हो सकी, लेकिन कुछ फिल्मों ने अमिट छाप छोड़ी जो आज भी प्रासंगिक हैं। हिन्दी - उर्दू भाषा में फिल्मों की स्क्रिप्ट तैयार की गई, गीत- ग़ज़लें तैयार की गई, साहित्यकारों, शायरों द्वारा। कुछ फिल्में साहित्यिक रचनाओं पर भी बनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि चरित्रों पर भी बनी, यहाँ तक कि मज़रूह सुल्तान पुरी, शाहिर लुधियानवी, शैलेन्द्र, गुलज़ार, निदा फ़ाज़लि, फैज़ अहमद फैज़, अहमद फ़राज़, जावेद अख़्तर जैसे साहित्यकार फिल्मी गीतों के ज़रिए ही ज़्यादा मशहूर हुए, लता मंगेशकर, आशा भोसले, सुरैया, हेमलता, कविता कृष्णमूर्ति, अनुराधा पोरवाल, नूरजहाँ, रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, कुमार शानू, उदित नारायण, पंकज उदास, जगजीत सिंह, भूपेन्द्र हज़ारिका, मनहर उदास द्वारा गुनगुनाए गीत और ग़ज़लें जो भारतीय सिनेमा की रीढ़ की हड्डी हैं, हिन्दुस्तान की ज़िंदगी हैं, जिनमें इस सरज़मीं का समाज राजनीति अर्थव्यवस्था मुहब्बत खूलूस है, आजकल पिछले 20 सालो में हज़ारों गीत हिन्दी सिनेमा में आए और गए, जिनसे दिल दिमाग को कोई राहत सुकून नहीं मिला, लेकिन पुराने समय के गीत और ग़ज़लें आज भी लाखों लोगों के दिल में समाए हैं, जो आम जन के अकेले पन के साथी हैं, मनोरंजन का ज़रिया हैं, हिन्दी- उर्दू की पहचान हैं, इन गीतों ग़ज़लों का संगीत और मधुर आवाज़ और कशिश  अपनी और खींचती है, दु:ख में सहारा देती है, मुहब्बत का अहसास कराती है, कमज़ोर पड़ने पर मज़बूत बनाती है।

"चल अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला "

"कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है"

"ये होशल कैसे रूके ये आरज़ू कैसे झुके मंज़िल दूर तो क्या साहिल धुंधला तो क्या ये आरज़ू कैसे झुके "

"तेरी है ज़मीं तेरा आसमां तू बड़ा मेहरबां  सबका है तू ख़ुदा मेरे तू बख़्शिश कर"

बाज़ार, लिबास, इजाज़त, उमराव जान, रज़िय सुल्तान, मुग्लेआज़म, पाक़िज़ा, काग़ज़ के फूल, प्यासा, साहब बीवी और ग़ुलाम, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, आख़िर क्यों, दस्तक, आँधी , अराधना, अमर प्रेम, सफर, किनारा, ख़ामोशी, गाईड, बम्बई का बाबू, तीसरी कसम, मेरा नाम जोकर, आनारकली, मदर इंडिया, गुमराह, द ट्रेन, मर्यादा, कश्मीर की कली, जंगली, साथ-साथ, कारवां, आपकी कसम, आप ऐसे तो न थे निकाह स्वीकार किया मैंने, मेरा साया, वक्त अनमोल घड़ी, मधुमति, जैसी हज़ारों फिल्में हैं जिनके हज़ारों गीत ग़ज़लें आज भी लोगों की ज़ुबां पर हैं।

कलात्मक फिल्में कुछ ऐसी हैं जो मशहूर भी हुई हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो उपेक्षित रही, बहुत अच्छी होते हुए भी ज़्यादा नहीं चली, बल्कि लोग उनसे नावाकिफ़ हैं इसके लिए अख़बार, पत्रिका, मिडिया भी जिम्मेदार है और कुछ हद तक लोग भी जिम्मेदार हैं। ऐसे ही हिन्दी सिनेमा की इन कलात्मक फिल्मों, क्लीसिकल फिल्मों के कुछ गीत ग़ज़लें भी उपेक्षित रह गए जो बेहतरीन स्क्रिप्ट और संगीत, आवाज़ के होते हुए भी ज़्यादा नहीं चले जैसे

"महवे ख़्याले यार हम को फिज़ा से क्या अब रंजिशे ख़ुशी से बहारों ख़िजाँ से क्या "

"ख़ामोश सा अफसाना पानी से लिखा होता न तुमने कहा होता न हमने सुना होता "

हिन्दुस्तान की राज्य और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को अपने सिलेबस में हिन्दी सिनेमा का इतिहास और उसकी खासियत के बारे में गीत संगीत गीतकारों संगीतकारों के बारे में पढ़ाना चाहिए, बल्कि दसवीं- बारहवीं कक्षा के सिलेबस में भी, और समय- समय पर कैम्पस, कॉलेज, स्कूलों में कलात्मक फिल्में दिखाई जानी चाहिए, ताकी आने वाली पीढ़ी में अच्छी फिल्मों में संगीत में रुचि पैदा हो । लेकिन अफसोस अब ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है।

मेहजबीं

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