वंशीधर ब्रजवासी का भाजपा में शामिल होना सामाजिक न्याय की राजनीति और शिक्षक मतदाताओं के विश्वास पर गंभीर सवाल!तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से नव निर्वाचित निर्दलीय विधान पार्षद श्री वंशीधर ब्रजवासी जी का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होना सामाजिक न्याय की राजनीति और उन्हें समर्थन देने वाले मतदाताओं के विश्वास के संदर्भ में गंभीर सवाल खड़ा करता है।श्री ब्रजवासी जी ने मनुवादी NDA एवं ब्राह्मण-भूमिहारवादी व्यवस्था के विरुद्ध सामाजिक न्याय के योद्धा के रूप में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी। अतिपिछड़े एवं मुस्लिम मतदाताओं सहित शिक्षकों के व्यापक समर्थन से मिली जीत के बाद उनका भाजपा में शामिल होने का निर्णय समर्थक वर्गों के बीच निराशा और असंतोष का कारण बना है।उनके इस राजनीतिक निर्णय से दलित-पिछड़े समाज के आत्मसम्मान और उन तमाम मतदाताओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है, जिन्होंने सामाजिक न्याय, शिक्षक हितों एवं परिवर्तन की उम्मीद के साथ उन्हें अपना समर्थन दिया था।हमारा सवाल है—1. क्या सत्ताधारी दल में शामिल होने के बाद श्री ब्रजवासी जी सरकार की शिक्षक-विरोधी नीतियों के विरुद्ध विधान परिषद में खुलकर आवाज उठा पाएंगे?2. क्या वे स्नातक शिक्षित बेरोजगारों, नियोजित शिक्षकों एवं अन्य शिक्षक समुदाय के हक-हकूक और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई लड़ पाएंगे?3. क्या वे सरकार की जनविरोधी एवं शिक्षक-विरोधी नीतियों के विरुद्ध सदन के साथ-साथ सड़क पर भी आंदोलन का नेतृत्व कर पाएंग

वंशीधर ब्रजवासी का भाजपा में शामिल होना: सामाजिक न्याय और शिक्षक मतदाताओं के विश्वास पर बड़े सवाल
तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय रूप से निर्वाचित विधान पार्षद बंशीधर (वंशीधर) ब्रजवासी के भाजपा के साथ जुड़ने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति में नया बवाल शुरू हो गया है। उनके समर्थक शिक्षक, स्नातक और सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े वर्ग इस निर्णय को चुनावी वादों और जनादेश के विरुद्ध बता रहे हैं।
क्या हुआ?
ब्रजवासी ने हालिया विधान परिषद चुनाव में तिरहुत स्नातक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जदयू के अभिषेक झा को 9,147 मतों के अंतर से हराया था। चुनाव जीतने के कुछ दिनों बाद, 31 अक्टूबर को उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात के बाद भाजपा में शामिल होने की घोषणा की।
ब्रजवासी ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ चर्चा के बाद यह निर्णय लिया, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि पार्टी में शामिल होकर वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों को बेहतर ढंग से उठा सकेंगे। उन्होंने शिक्षकों के हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।
विवाद की जड़
विवाद इसलिए गहरा है कि ब्रजवासी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे और उनकी जीत को शिक्षक हितों, स्नातक बेरोजगारों तथा सामाजिक न्याय की मांगों से जोड़ा जाता रहा है। उनके भाजपा के साथ जुड़ने के बाद सवाल उठ रहा है कि जिन मुद्दों पर वे सत्ताधारी गठबंधन के विरुद्ध आवाज उठाते रहे थे, उन पर अब सरकार के भीतर रहकर कितनी स्पष्ट भूमिका निभा पाएंगे।

इस घटनाक्रम पर राजद नेता तेजस्वी यादव ने दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है। उनका तर्क है कि निर्दलीय रूप से निर्वाचित होने के बाद किसी दल की सदस्यता लेना संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल कानून, के दायरे में आ सकता है।

 आरक्षण बचाओ संघर्ष मोर्चा का आरोप

आरक्षण बचाओ संघर्ष मोर्चा, बिहार के संयोजक नागेंद्र कुमार पासवान ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि ब्रजवासी ने सामाजिक न्याय के योद्धा के रूप में राजनीतिक पहचान बनाई थी। मोर्चे का आरोप है कि अति पिछड़े, दलित, पिछड़े और मुस्लिम समेत शिक्षक मतदाताओं के समर्थन से जीत हासिल करने के बाद भाजपा में शामिल होना उनके विश्वास के साथ न्याय नहीं है।

मोर्चे ने कहा कि ब्रजवासी का निर्णय दलित-पिछड़े समाज के आत्मसम्मान और उन मतदाताओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, जिन्होंने उन्हें परिवर्तन और शिक्षक हितों की उम्मीद में वोट दिया था। संगठन ने उन पर आरोप लगाया कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग के एक उभरते चेहरे को अपने राजनीतिक दायरे में लेकर सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

 मोर्चे के चार सवाल

आरक्षण बचाओ संघर्ष मोर्चा ने ब्रजवासी से चार सार्वजनिक सवाल पूछे हैं:

- क्या वे भाजपा में शामिल होने के बाद भी सरकार की कथित शिक्षक-विरोधी नीतियों के विरुद्ध विधान परिषद में खुलकर आवाज उठा पाएंगे?
- क्या वे स्नातक बेरोजगारों, नियोजित शिक्षकों और शिक्षक समुदाय के अधिकारों के लिए प्रभावी संघर्ष कर पाएंगे?
- क्या वे सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सदन और सड़क—दोनों स्तरों पर आंदोलन का नेतृत्व कर पाएंगे?
- क्या वे उन मतदाताओं के प्रति जवाबदेह रहेंगे, जिन्होंने सामाजिक न्याय और व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद में उन्हें वोट दिया था?

 अब क्या होगा?

ब्रजवासी ने अपने बचाव में कहा है कि उनका उद्देश्य शिक्षकों के हितों की आवाज बुलंद करना है और उन्होंने दावा किया कि भाजपा में शामिल होने से उन्हें अपने क्षेत्र के मुद्दे अधिक प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर मिलेगा।

लेकिन राजनीतिक विरोधियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि असली परीक्षा अब विधान परिषद की कार्यवाही, शिक्षक नीतियों और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर उनकी व्यवहारिक भूमिका से होगी। जब तक वे अपने मतदाताओं के सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब नहीं देते, यह विवाद बिहार की राजनीति में बना रहेगा।

 

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