Wednesday, February 28, 2018

साक्षर भारत की जमीनी हकीकत हक़ीक़त के आईनें में

बिहार में साक्षरता दर बढ़ाने के लिए वर्ष 2012 में साक्षर भारत मिशन प्राधिकरण बिहार ने साक्षर भारत अभियान का आग़ाज़ किया था और सम्पूर्ण बिहार में ज़िला स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक साक्षरता समिति का गठन किया गया था। जिला में जिला लोक शिक्षा समिति, प्रखण्ड में प्रखण्ड लोक शिक्षा समिति और पंचायत में पंचायत लोक शिक्षा समिति का गठन किया गया साथ ही साक्षरता को गति देने और असाक्षर को साक्षर करने के लिए जिला मुख्य कार्यक्रम समन्वयक,कार्यक्रम समन्वयक, एस आर जी, लेखा समन्वयक, प्रखण्ड कार्यक्रम समन्वयक, प्रखण्ड लेखा समन्वयक, के आर पी, प्रत्येक पंचायत में वरीय प्रेरक,प्रेरक का नियोजन किया गया।योजना पाँच वर्षों की थी परन्तु विस्तार दे कर छः वर्ष कर दिया गया जो 31 मार्च 2018 को समाप्त हो जाता है।
इन छः वर्षों में असाक्षर  15 से 35 वर्ष की महिलाओं को साक्षर करने के लिए बिहार में अरबों की राशि पानी की तरह बहा दिया गया मगर क्या 15 से 35 वर्ष की असाक्षर महिला साक्षर हुई ? आज भी पहेली बना हुआ है।सच्चाई तो ये है कि असाक्षर ज़मीनी स्तर पर साक्षर तो नही हुई मगर काग़ज़ी तौर पर साक्षर हो गई और उन्हें साक्षर होने का प्रमाण पत्र भी महापरीक्षा ले कर दे दिया गया (काग़ज़ में) मगर हक़ीक़त में महिलाओं को पता भी नहीं है कि उनको साक्षर होने का प्रमाण पत्र दे दिया गया है ! बिहार में ये महा साक्षरता घोटाला है इस की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए।
आम आदमी ये जानता भी नही है कि असाक्षरों को साक्षर करने का प्रोग्राम सरकार चला रही है और सरकार के पदाधिकारियों के द्वारा काग़ज़ी खाना पूरी कर साक्षर किया जा रहा है, प्रमाण पत्र बाँटा जा रहा है ।
""साक्षरता की जमीनी हकीकत यही है कि जो असाक्षर था/थी वह आज भी असाक्षर है।""
सरकार को चाहिए कि साक्षर भारत अभियान को जिस की अवधि 31 मार्च को समाप्त हो रही पुनः विस्तारित न किया जाए बल्कि नए सिरे से ठोस प्लानिंग तैयार है साक्षरता प्रोग्राम को प्रारंभ किया जाय।

Saturday, February 24, 2018

पितृत्व और मातृत्व अवकाश से संबंधित पत्र

श्री गाँधीहाई स्कूल परिहार पीसीपी पर 24/25 फरवरी को क्लासेज स्थगित रहेगा

श्री गाँधीहाई स्कूल परिहार पीसीपी पर 24/25 फरवरी को डीएलएड क्लासेज उपस्कर के अभाव में स्थगित रहेगा ये जानकारी स्टडी सेंटर समन्वयक द्वारा जारी की गई है।

Friday, February 23, 2018

तीन तलाक के खिलाफ 5 मार्च को दरभंगा कमिशनरी पर होगा मुस्लिम औरतों का एहतजाजी जुलूस

तीन तलाक के खिलाफ 5 मार्च को दरभंगा कमिशनरी पर होगा मुस्लिम औरतों का एहतजाजी जुलूस

दरभंगा- 19 फरवरी 2018 ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां, इंसाफ मंच, ऑल इंडिया जमीअतुर राईन, ऑल इंडिया अकलियत जागरण सोसाईटी, बिहार स्टेट मोमिन कान्फ्रेंस एवं अल-मदद एजुकेशनल एण्ड वेलफेयर ट्रस्ट, पटना के संयुक्त बैनर तले एक आपात बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड पटना के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 मौलाना एजाज अहमद ने की। बैठक में सर्वसम्मती से यह निर्णय लिया गया कि दिनांक 5 मार्च 2018 दिन के 11 बजे दरभंगा कमिशनरी से मुस्लिम औरतों और मर्दों का एक एहतजाजी जुलूस निकाला जाएगा। एहतजाजी जुलूस की बैठक बेदारी कारवाँ के क्षेत्रीय कार्यालय, लालबाग, दरभंगा में की गई। बैठक के माध्यम से डा0 असरारुलहक लाडले, नेयाज अहमद, डा0 राहत अली, शाहिद अतहर, राजद के जिला संयोजक रामचन्द्र यादव, नजरे आलम, पप्पू खान, शम्स तबरेज जुगनू आदि ने मिथिलाँचल के सभी समाजी एवं फलाही तंजीमों के जिम्मेदारों, मदारिस के जिम्मेदारों, मसाजिद के इमाम व खतीब, समाजसेवी, दानिशवरान एवं अमन पसन्द लोगों से एहतजाजी जुलूस को कामयाब बनाने की अपील की गई है कि बड़ी संख्या में अपने अपने मोहल्ले और गाँव से मुस्लिम औरतों को जुलूस में शिरकत की दावत दें और अपनी सरपस्ती में कमिश्नरी तक लेकर आऐं। तीन तलाक पर बनाया जा गया काला कानून ना सिर्फ मुस्लिम मर्दों को जेल में डालने की साजिश है बल्कि मुस्लिम महिलाओं पर भी अत्याचार है। साथ ही तीन तलाक का मामला मुसलमानों के मजहब से जुड़ा हुआ मामला है इसलिए मुसलमान किसी भी हालत में मजहब में मुदाखलत बर्दाश्त नहीं करेगा। काला कानून हर हालत में सरकार को वापस लेना ही होगा।

बिहार में निवास करने वाले मुस्लिम समुदाय के शैख़, पठान/खान, सय्यद जातियों को ईबीसी श्रेणी में सम्मिलित किया जाये - मोहम्मद कमरे आलम

बिहार में निवास करने वाले मुस्लिम समुदाय के शैख़, पठान/खान, सय्यद जातियों को अतिपिछड़ा वर्ग की श्रेणी में सम्मिलित किया जाये ।
मोहम्मद कमरे आलम ज़िला अध्यक्ष भारतीय माइनॉरिटीज सुरक्षा महासंघ सीतामढ़ी ने माननीय मुख्यमंत्री बिहार से ,बिहार में निवास करने वाले मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे अधिक कमज़ोर शैख़, पठान/खान और सय्यद जातियों को EBC श्रेणी में सम्मिलित किया जाय।
" सच्चर कमिटी ने भी ने अपने रिपोर्ट में मुसलमानों की स्थिति के बारे में स्पष्ट लिखा है कि मुसलमानों शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति दलितों से कई गुना बदतर है।"
बिहार में तो अनेक्चर 1 में सम्मिलित मुस्लिम जातियों से भी बदतर हालात शैख़ पठान/खान और सय्यद की हो चुकी है।
""न्याय के साथ विकास "" नीति कार्यक्रम के तहत न्याय करते हुए उक्त मुस्लिम समुदाय के जातियों के साथ न्याय किया जाय और EBC श्रेणी में सम्मिलित करने की माँग की है।


तालिमी मरकज़ में नियोजित मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के स्वयं सेवक को हटाया जाना उच्च जातियों के विकास के लिए गठित राज्य आयोग बिहार के संकल्प का उल्लंघन है - मोहम्मद कमरे आलम

तालिमी मरकज़ में नियोजित मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के स्वयं सेवक को हटाया जाना उच्च जातियों के विकास के लिए गठित राज्य आयोग बिहार के संकल्प का उल्लंघन है - मोहम्मद कमरे आलम
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मोहम्मद कमरे आलमने कहा है कि तालिमी मरकज़ में नियोजित मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के स्वयं सेवक को हटाया जाना उच्च जातियों के विकास के लिए राज्य आयोग बिहार के संकल्प का उल्लंघन है। मोहम्मद कमरे आलम ने कहा है कि उच्च जातियों के विकास के लिए गठित राज्य आयोग बिहार के संकल्प के मुख्य विंदू "2" शिक्षा के अवसर में स्पष्ट है कि उच्च जाति के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग सरकार के विद्यालय ,चर्चा केंद्र, प्रयास केंद्र, मकतब मदरसा ,नवाचारी केंद्र, तालिमी मरकज़ का लाभ ले सकते हैं।वहीं निदेशक जन शिक्षा शिक्षा विभाग बिहार पटना द्वारा 30 जनवरी 2018 को आहूत राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में सभी जिलों के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी साक्षरता को निर्देशित किया गया है कि अगर तालिमी मरकज़ में अगर मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के शिक्षा स्वयं सेवक बहाल हो गए हैं तो उनसे स्पष्टीकरण की माँग करते हुए चयन मुक्त कर रिपोर्ट राज्य कार्यालय को दें ।निदेशक के निर्देश का अनुपालन साक्षरता के डी पी ओ द्वारा शुरु कर दिया गया है और मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के स्वयं सेवक से स्पष्टीकरण की माँग कर चयन मुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।मालूम हो की तालिमी मरकज़ का आगाज़ बिहार के सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2008 में नीतीश कुमार की सरकार ने शुरू किया था ।

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Friday, February 16, 2018

एन०आई०ओ०एस द्वारा संचालित डी० एल० एड० में अध्ययन केंद्र द्वारा उर्दू में हस्ताक्षर करने पर आपत्ति और उर्दू में लिखा असाइनमेंट लेने से इंकार

एन०आई०ओ०एस द्वारा संचालित डी० एल० एड० में अध्ययन केंद्र द्वारा उर्दू में हस्ताक्षर करने पर आपत्ति और उर्दू में लिखा असाइनमेंट लेने से इंकार किया जा रहा है।NIOS द्वारा अप्रशिक्षित शिक्षकों को डीएलएड का प्रशिक्षण ऑन लाइन दिया जा रहा है और वर्क शॉप हेतु सीतामढ़ी ज़िला में लगभग 56 अध्ययन केंद्र की स्थापना कर 15 दिवसीय वर्क शॉप का प्रारंभ  3 फरवरी से किया जा रहा है लगभग सभी अध्ययन केंद्रों पर अप्रशिक्षित उर्दू शिक्षकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और उर्दू में हस्ताक्षर करने पर प्रशिक्षक द्वारा आपत्ति जताई जाती है और कहा जाता है कि उर्दू में लिखा असाइनमेंट भी नहीं लेंगें।
निओस के रिजिनल डायरेक्टर का स्पष्ट आदेश है कि उर्दू में प्रशिक्षणार्थी असाइनमेंट लिख सकते हैं और उर्दू में परीक्षा भी दे सकते हैं मगर PCP पर तैनात साधन सेवी द्वारा हस्ताक्षर पर ही आपत्ति जताई जा रही है।
PCP पर साधन सेवी के चयन में भी लापरवाही बरती गई है उर्दू भाषी साधन सेवी का चयन नही किया गया है जबकि भाषा के साधन सेवी का चयन नियमयता करने का प्रावधान है।

तालिमी मरकज़ में कार्यरत सामान्य मुस्लिम वर्ग के स्वयं सेवकों को मानवीय आधार/पूर्व घोषित नीति के अनुरूप बहाल रखा जाए - राकेश कुमार सिंह

राकेश कुमार सिंह महा सचिव ज़िला जनता दल यू सीतामढ़ी ने माननीय मुख्यमंत्री बिहार को पत्र लिखकर तालिमी मरकज़ में कार्यरत सामान्य मुस्लिम वर्ग के स्वयं सेवकों को मानवीय आधार/पूर्व घोषित नीति के अनुरूप बहाल रखने की माँग की है ।  राकेश कुमार सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के प्रसार हेतु वर्ष 2008 में तालिमी मरकज़ का प्रारंभ किया गया था जिसमें तत्कालीन प्रावधान के अनुसार सभी कोटि सामान्य सहित मुस्लिम समुदाय का नियोजन स्वयं सेवक के रूप में किया गया था।कालांतर में अनेक्चर 1 में सम्मिलित मुस्लिम जाति के लिए आरक्षित कर सामान्य मुस्लिम समुदाय के नियोजित स्वयं सेवक को विभाग द्वारा हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।वर्षो तक सेवा देने के बावजूद चयन मुक्ति से हज़ारों स्वयं सेवकों के समक्ष भूखमरी की स्थिति बन सकती है जो न्याय के साथ विकास की वर्तमान जारी नीति के अनुरूप नही होगा। श्री सिंह ने स्वयं सेवकों के साथ होने वाले अन्याय पर समुचित संज्ञान लेने का अनुरोध माननीय मुख्यमंत्री बिहार से किया है

Sunday, February 11, 2018

एन० आई० ओ० एस द्वारा संचालित डी० एल० एड० में अध्ययन केंद्र द्वारा उर्दू में हस्ताक्षर करने पर आपत्ति और उर्दू में लिखा असाइनमेंट लेने से इंकार

एन ०आई ०ओ ०एस द्वारा संचालित डी० एल० एड० में अध्ययन केंद्र द्वारा उर्दू में हस्ताक्षर करने पर आपत्ति और उर्दू में लिखा असाइनमेंट लेने से इंकार किया जा रहा है।NIOS द्वारा अप्रशिक्षित शिक्षकों को डीएलएड का प्रशिक्षण ऑन लाइन दिया जा रहा है और वर्क शॉप हेतु सीतामढ़ी ज़िला में लगभग 56 अध्ययन केंद्र की स्थापना कर 15 दिवसीय वर्क शॉप का प्रारंभ  3 फरवरी से किया जा रहा है लगभग सभी अध्ययन केंद्रों पर अप्रशिक्षित उर्दू शिक्षकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और उर्दू में हस्ताक्षर करने पर प्रशिक्षक द्वारा आपत्ति जताई जाती है और कहा जाता है कि उर्दू में लिखा असाइनमेंट भी नहीं लेंगें।
निओस के रिजिनल डायरेक्टर का स्पष्ट आदेश है कि उर्दू में प्रशिक्षणार्थी असाइनमेंट लिख सकते हैं और उर्दू में परीक्षा भी दे सकते हैं मगर PCP पर तैनात साधन सेवी द्वारा हस्ताक्षर पर ही आपत्ति जताई जा रही है।
PCP पर साधन सेवी के चयन में भी लापरवाही बरती गई है उर्दू भाषी साधन सेवी का चयन नही किया गया है जबकि भाषा के साधन सेवी का चयन नियमयता करने का प्रावधान है।

Friday, February 09, 2018

तालिमी मरकज़ में नियोजित सामाजिक तथा आर्थिक रूप से अत्यन्त पिछड़े मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के शिक्षा स्वयं सेवी को बहाल रखा जाए

सेवा में,
श्री नीतीश कुमार
माननीय मुख्यमंत्री
बिहार सरकार पटना

विषय :- तालिमी मरकज़ में नियोजित सामाजिक तथा आर्थिक रूप से अत्यन्त पिछड़े मुस्लिम समुदाय के सामान्य कोटि के शिक्षा स्वयं सेवी को बहाल रखने के साथ ही साथ मार्गदर्शिका संशोधित करने का आदेश देने के सम्बंध में।

महाशय,
निवेदन पूर्वक कहना है कि आपके द्वारा वर्ष 2008 में बिहार के मुस्लिम समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा सुनिश्चित करने हेतु सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय के प्रत्येक गाँव/टोला में वैकल्पिक तथा नवाचारी शिक्षा के अंतर्गत (मुस्लिम समुदाय के 06 से 10 वर्ष के बच्चों के लिए ग़ैर आवासीय सेतु कार्यक्रम ) तालिमी मरकज़  प्रारंभ किया गया था जिस में शिक्षा स्वयं सेवी के रूप में आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय के सामान्य वर्ग के आवेदक का भी नियोजन किया गया था और इस आशय का मार्गदर्शिका पत्रांक-AIE/92/2008 -09 /5344 दिनांक - 13.10.2008 भी निर्गत किया गया था और जिला शिक्षा अधीक्षक सह जिला कार्यक्रम समन्वयक बिहार शिक्षा परियोजना सीतामढ़ी का पत्रांक 1151 दिनांक 19 .11.2008 निर्गत हुआ था जिस के आलोक में नियोजन किया गया था ,परन्तु बाद के दिनों में आपके मंशा के विरुद्ध येन केन प्रकारेण मार्गदर्शिका में संशोधन कर उक्त योजना को सिर्फ मुस्लिम समुदाय के अनेक्चर - 1 जाति में सम्मिलित मुस्लिम के लिए आरक्षित कर दिया गया और मार्गदर्शिका दस महीने बाद पत्रांक TM/AIE/92/2008-09/3982 दिनांक 14.08.2009 और ज्ञापाक  AIE/577 दिनांक 18.08.2009 निर्गत कर दी गई।उक्त योजना का संचालन  09 दिसम्बर 2012 तक बिहार शिक्षा परियोजन परिषद पटना के अधीन था वर्तमान में यह योजना 10 दिसम्बर 2012 से जन शिक्षा, जन शिक्षा निदेशालय, शिक्षा विभाग बिहार पटना के अधीन संचालित किया जा रहा है और तालिमी मरकज़ शिक्षा स्वयं सेवी को दलित महादलित अल्पसंख्यक एवं अतिपिछड़ा वर्ग अक्षर आँचल योजना से जोड़ कर कार्य लिया जा रहा है।
इधर जन शिक्षा निदेशालय द्वारा शिक्षा स्वयं सेवी के रूप में नियोजित सामान्य वर्ग के मुस्लिम को चयन मुक्त करने की बात की जा रही है जो मुस्लिम समुदाय के साथ अन्याय है।माननीय मुख्यमंत्री महोदय सच्चर कमिटी ने भी अपने रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि मुसलमानों की शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति दलितों से भी कई गुणा बदतर हो चुकी है यह टिपण्णी एंटायर मुसलमानों के लिए की गई है न कि अनेक्चर - 1 में सम्मिलित मुसलानों के लिए मात्र।यह हक़ीक़त है कि सामान्य कोटि के मुसलमानों की स्थिति अनेक्चर - 1 में सम्मिलित मुस्लिमों से भी दयनीय है और योजना का सही हक़दार सामान्य कोटि के सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमान ही हैं।और यह कार्यक्रम आपके द्वारा सभी मुसलमानों को लक्ष्य कर ही शुरू किया गया था।

अतः माननीय मुख्यमंत्री महोदय से विनम्र निवेदन है कि तालिमी मरकज़ में नियोजित सामान्य कोटि के मुस्लिम शिक्षा स्वयं सेवक को बहाल रखा जाय और मार्गदर्शिका में संशोधन कर आरक्षित मुस्लिम -1 को अनारक्षित मुस्लिम किया जाय ताकि योजना का लाभ मुसलमानों को सही तरीके से मिलता रहे और योजना का सही मक़सद परिलक्षित हो।

विश्वास भाजन
मोहम्मद कमरे आलम
एकडण्डी, परिहार, सीतामढ़ी
पिन 843324
मोबाइल 9199320345
mdqamarealam6@gmail.com

مسلمانان ہند کی نئی حکمت عملی

مسلمانان ہند کی نئی حکمت عملی۔

(.مہاراشٹر کے تاریخی شہر احمد نگر میں مولانا سجاد صاحب نعمانی مد ظلہ نے علماء کی کثیر تعداد کے سامنے ایک اہم بیان فرمایا اسی تقر…February 02, 2018


مسلمانان ہند کی نئی حکمت عملی۔

(.مہاراشٹر کے تاریخی شہر احمد نگر میں مولانا سجاد صاحب نعمانی مد ظلہ نے علماء کی کثیر تعداد کے سامنے ایک اہم بیان فرمایا اسی تقریر کو تحریری شکل میں الفرقان میں شائع کیا گیا ہے۔مضمون تھوڑا طویل ہے، لیکن بڑا اہم ہے ضرور پڑھیں خاص کر علماء وقت فارغ کر کے اسے ضرور پڑھیں۔) 

بعد حمد و صلاة۔۔۔۔۔۔۔

ہم حالت جنگ میں ہیں اور جنگوں میں کبھی بھی ایک ہی طریقہ نہیں اپنایا جاتا، جنگی حکمت عملی بدلتی رہتی ہے، ہر جنگ اس وقت کے مناسب حالات اور طریقے کے مطابق لڑی جاتی ہے۔سیرت نبوی کا نمونہ ہمارے سامنے ہے، بدر میں تو کوئی تیاری ہی نہیں تھی اچانک جنگ سامنے آ گئی، احد میں مسئلہ پیش آیا تو مشورہ ہوا، اس مشورہ میں دو رائے آئیں، ایک رائے یہ تھی کہ باہر نکل کر جنگ نہ کی جائے ہماری پوزیشن ایسی نہیں ہے کہ ہم باہر نکل کر جنگ کریں، بدر کی فتح کے با وجود اکثر صحابہؓ کی رائے یہی تھی کہ باہر نکل کر جنگ نہ کی جائے، لیکن نوجوانوں کی رائے تھی کہ مدینہ سے باہر نکل کر جنگ کی جائے اور اللہ کے رسولﷺ نے مصلحتا نوجوانوں کی رائے کو قبول کرلیا اور جنگ ہوئی، اس کے بعد خندق کی جنگ اللہ کے رسولﷺ نے بالکل نئے طریقے سے لڑی۔۔۔یہ میں اشارے کر رہا ہوں آپ اہل علم ہیں آپ کے سامنے تفصیلات بیان کرنے کی ضرورت نہیں ہے۔

ہمارے ملک میں کفر و اسلام، حق و باطل اور ظلم و انصاف کی لڑائی چل رہی ہے، اس کی حکمت عملیاں بھی بدلتی رہی ہیں اور بدلتے رہنے کی ضرورت ہے، ہمیں جاننا چاہیے کہ ہمارے ملک میں ظلم و انصاف کی جو بھیانک جنگ عرصہ سے چل رہی ہے، اس کے مختلف مراحل اور اسٹیج آئے ہیں، آپ کا یہ احمد نگر کا علاقہ بھی اس جنگ کی تاریخ کا ایک گواہ رہا ہے، اس جنگ کا ایک مرحلہ یہاں سے بھی گزرا ہے، ہمارے دور میں وہ جنگ ایک فیصلہ کن دور میں پہونچ رہی ہے، میں پوری ذمہ داری کے ساتھ یہ بات عرض کر رہا ہوں کہ وہ جنگ فیصلہ کن اسٹیج پر پہونچ رہی ہے، ذراسی غلطی، بہت بھیانک نتیجوں تک پہونچا سکتی ہے، اور اگر خوب گہرے غور و فکر کے ساتھ جنگ کی صحیح حکمت عملی کو سمجھ لیا گیا تو اس وقت کے حالات ایسے ہیں کہ امن و انصاف کے علم برداروں اور حق کے خدمت گزاروں کو وہ کامیابی مل سکتی ہے جس کا نہ دوستوں کو اس وقت تصور ہے نہ دشمنوں کو۔

پرانی حکمت عملی پر نظر ثانی کی ضرورت

ہم نے پرانی حکمت عملی جو اپنائی تھی وہ اب کارگر ثابت نہیں ہو رہی ہے۔بلا شبہ اب ہمیں کوئی نئی حکمت عملی کی ضرورت ہے، جنگ کبھی بھی اس طرح نہیں لڑی جاتی کہ بھئی یہ تو پرانی حکمت عملی کے خلاف طریقہ ہے، اس کو بدلا نہیں جا سکتا۔جس وقت سیدنا سلمان فارسیؓ نے غزوہ خندق کے موقع پر حضورﷺ کے سامنے یہ رائے پیش کی کہ خندق کھود دی جائے،مکہ کی طرف سےمدینہ کا راستہ بند کردیا جائے اور پورے راستے میں اتنی لمبی، اتنی چوڑی اور اتنی گہری خندق کھود دی جائے، تو اللہ کے رسولﷺ نے یا صحابہ نے یہ نہیں کہا کہ بھئی ہم نے تو آج تک ایسی حکمت عملی نہ دیکھی نہ سنی، یہ طریقہ تو ہمارا نہیں ہے، یہ طریقہ ہمارے بزرگوں کا نہیں ہے، یہ سب نہیں کہا، بل کہ اللہ کے رسولﷺ نے فورا قبول کیا اور پھر چوبیسوں گھنٹے عدیم المثال محنت کر کے چند دن اور چند راتوں کے اندر ایسی خندق تیار کردی جو پوری عرب کی تاریخ میں نہ کسی نے دیکھی تھی نہ سنی تھی، اور پھر وہ جنگی حکمت عملی کس طرح کامیاب ہوئی وہ ہم سب جانتے ہیں۔و رد الله الذين كفروا بغيظهم لم ينالوا خيرا. (اور اللہ نے واپس کردیا کفر والوں کو ان کے غیظ و غضب سمیت اس طرح کے ان کے ہاتھ کچھ نہ لگا)[ الأحزاب: ٢٥]

جو حکمت عملی ہم نے پورے اخلاص اور شعور کے ساتھ آزادی کے بعد سے اب تک اپنائی، اس کی بنیاد یہ تھی کہ اس ملک میں ہندو اکثریت میں ہے اور ہم اقلیت میں ہیں، ہمارے پاس اس کے سوا کوئی راستہ نہیں ہے کہ سیکولر مزاج ہندوؤں کو سپورٹ کریں، اور ان کو تقویت پہونچائیں، کیونکہ ہندو دو قسم کے ہیں ایک سیکولر اور ایک فرقہ پرست، ۔۔۔۔۔اکثریت میں تو وہی ہیں ملک تو انہی کو چلانا ہے، پس ہمارے لیے تو صرف یہی راستہ ہے کہ ان میں سے جو سیکولر لوگ ہیں، ہم ان کو طاقت پہونچائیں، ان کو ووٹ دیں، ان کو آگے بڑھائیں، اور جو فرقہ پرست ہیں ان کو کمزور کریں، اسی حکمت عملی پر ہم نے اب تک عمل کیا ہے، اور پورے اخلاص کے ساتھ کیا ہے، کم سے کم مجھ کو کوئی بد نیتی اس میں دور دور تک نظر نہیں آتی، لیکن آپ دیکھیے کہ اس حکمت عملی کا نتیجہ کیا نکل رہا ہے؟ جن کو ہم سیکولر سمجھ کر ان پر اعتماد کیا ہوا تھا، ان کا کیا کردار اب تک سامنے آیا ہے؟ کیا اب وقت نہیں آ گیا کہ ہم اپنی حکمت عملی پر نظر ثانی کریں، غور کریں، باہم اصلاح و مشورہ کریں۔المؤمن لا يلدغ من جحر مرتين(مسلمان کبھی ایک سوراخ سے دوبار نہیں ڈسا جاتا) ہم تو ہزاروں بار ڈسے جا چکے ہیں، ہمارے ایمانی وجود کا یہ تقاضہ ہے کہ ہم اپنی حکمت عملی پر بڑے ٹھنڈے دل و دماغ سے بہت بصیرت کے ساتھ نظر ثانی کریں، اور ہم یہ دیکھیں کہ کیوں ہم کامیاب نہیں ہو رہے؟ کیا ہوا ہے ہمارے ساتھ؟ ۔

اس حکمت عملی کو برتتے برتتے آج یہ حال ہے کہ جس قوم کو ہم ہندو کہتے تھے اس کی بہت بڑی تعداد واقعی فرقہ پرست بن گئی، اور یہ سب اسی سیکولر نظام کے تحت ہوا، اسی نے نظام تعلیم ایسا چلایا، میڈیا اور اخبارات کو ایسا رنگ دیا، ایسی پالیسیاں بنائیں، بار بار یہ تجربہ ہوتا رہا کہ یہ ‌‌"سیکولر ‌‌" لوگ ‌‌"فرقہ پرستون ‌‌" سے سمجھوتا کرتے رہے، شاید ایک بار بھی انہوں نے سیکولرزم کے تحفظ اور فرقہ پرستوں کے مقابلے کے لیے کوئی مضبوط اصولی موقف اختیار نہیں کیا، اور اب صورت حال یہ ہے کہ نظر ہی نہیں آتا کہ ملک میں سیکولر ہے کون؟ ہمیں ضرور سوچنا چاہیے کہ کیا ہماری یہ حکمت عملی کامیاب ہوتی ہوئی نظر آ رہی ہے؟ یہ جو عام مسلمانوں میں آپ ایک بے چینی دیکھ رہے ہیں اور سمجھ میں نہیں آ رہا کہ کیا کریں؟ یہ ہماری تاریخ کا ایک ہم مرحلہ ہے، اگر اس وقت قوم کو دوسری حکمت عملی کی طرف نہیں لے جایا گیا تو قوم ہار مان جائے گی، شکست کھا جائے گی، اور اس کے بعد پھر قوموں کا اٹھنا بہت مشکل ہوتا ہے، قوم اگر ہار مان جائے اور اندر سے ٹوٹ جائے، تو پھر اس قوم میں ارتداد اور بغاوت پھیلنے کے امکانات بہت بڑھ جاتے ہیں، #مایوسی ارتداد تک اور غصہ دہشت گردی تک لے جاتا ہے۔یہی وجہ ہے کہ قرآن نے کہا: انه لا ييئس من روح الله الا القوم الكفرون. کہ خدا کی رحمت سے کافر ہی مایوس ہوتے ہیں یعنی مایوسی کفر و ارتداد تک لے جاتی ہے اور لے جا رہی ہے۔توجہ سے سنیے! میں یہ نہیں کہ رہا ہوں کہ لے جائے گی، میں کہ رہا ہوں مایوسی کفر تک لے جا رہی ہے۔ہمیں پتا نہیں کہ اب مسلمان جئے شری رام کے نعرے لگانے میں فخر محسوس کر رہا ہے، پانچسو روپیے میں ایمان بیچا جا رہا ہے، دوسری طرف جو غصہ اور فرسٹریشن ہے وہ لے جاتا ہے اس طرف جس کو آج کل کی اصطلاح میں دہشت گردی کہتے ہیں اور دونوں راستے ہلاکت کے ہیں، ضرورت ہے کہ س وقت با شعور لوگ خلوص کے ساتھ نئی حکمت عملی پر غور کریں، تلاش کریں، صدقہ اور صلوة الحاجة کا اہتمام کر کے اللہ سے مانگیں کہ ۔اللہم الھمنا مراشد امورنا۔اے اللہ ہمیں راستہ دکھا دیجیے اور بتا دیجیے کہ اس وقت کیا کرنا ہے، اور جب کوئی راستہ دکھایا جائے تو اگر اسے فورا قبول نہ کیا جائے تو فورا مسترد بھی نہ کیا جائے، اس پر غور کیا جائے، سوچا جائے، اس کے بارے میں بحث اور تبادلہ خیال کیا جائے۔اس کے متوقع نتیجوں کو قریب سے دیکھنے کی کچھ دن کوشش کی جائے، اس کے بعد رائے بنائی جائے، لیکن نئی حکمت عملی پر غور کرنا، نئی حکمت عملی کو اللہ سے مانگنا، اس کی توفیق و رہبری مانگنا کم سے کم علماء، اہل دانش اور ارباب حل و عقد کے ذمہ اس وقت کا فریضہ ہے۔

حکمت عملی کی بنیاد کا تجزیہ ضروری ہے

سب سے پہلے اس بات پر غور کریں کہ کیا یہ بات سچی اور مطابق واقعہ ہے کہ ہمارے ملک میں ‌‌"ہندو ‌‌" اکثریت میں ہیں۔کیا بڈھسٹ ہندو ہیں؟ بدھ ازم تو پیدا ہی ہوا تھا ہندو ازم کے خلاف بغاوت کے طور پر، ویدک دھرم، مورتی پوجا اور طبقاتی نظام سے تنگ آ کر بدھ ازم بنا تھا، کس نے کہ دیا کہ بدھسٹ ہندو ہیں؟ کیا سکھ ہندو ہیں؟ کیا لنگایت ہندو ہیں؟ جن کی ساڑھے سات کروڑ آبادی ہے، لنگایت آج سے آٹھ سو سال پہلے بنایا گیا ایک مذہب ہے جو در اصل برہمنیت کے خلاف ایک زبردست قسم کی بغاوت تھی، میں نے خود لنگایت کے لٹریچر کو تھوڑا بہت پڑھا ہے اور ان کے مذہبی رہنماؤں سے تھوڑا سا رابطہ ہے۔انگریزوں کے زمانے میں انہیں ہندوؤں اور مسلمانوں سے الگ ایک مستقل مذہبی گروہ تسلیم کیا جاتا تھا، آزادی کے بعد سیکولر حکومت نے انہیں زبردستی ہندو قرار دے دیا۔ان میں آج کل اس کے خلاف ایک زبردست تحریک چل رہی ہے۔ہمیں پوری ایمانداری اور اور حکمت کے ساتھ ان کی تحریک کو تقویت پہونچانی چاہیے۔آدیواسی جو اس ملک کی اصلی آبادی ہے اور ان کی تعداد ۱۱ کروڑ سے بھی زیادہ ہے کیا وہ ہندو ہیں؟ آدیواسی کسی مورتی کی پوجا نہیں کرتے اور چلا چلا کر کہتے ہیں کہ ہم ہندو نہیں ہیں، لیکن عجب شرارت ہوئی ہے ہمارے ملک میں کہ کروڑو آدیواسیوں کو ہندو بنا لیا گیا ان کو بتائے بغیر، پوچھنا تو دور کی بات ہے، بنانے کے بعد بھی نہیں بتایا گیا کہ آپ ہندو ہیں، وہ کہ رہے ہیں کہ بھائی ہم ہندو نہیں ہیں، ان سے کہا جا رہا ہے کہ نہیں نہیں ہم ہندو ہیں، ایک آدمی کہ رہا ہے کہ میرا نام محمد سعید ہے اس سے کہا جا رہا ہے نہیں آپ کا نام محمد سعید نہیں زین العابدین ہیں، کیا تماشہ ہو رہا ہے؟ مزید سوچیے کہ کیا اس ملک کے شیڈول کاسٹ کے لوگ ہندوں ہیں؟ یا انہیں صرف سیاسی طور اور ہندو اکثریت بنانے کے لیے ہندو بنا لیا گیا۔ہمیں جاننا چاہیے کہ اس وقت ان کے اندر (جن کو عام طور پر دلت کہا جاتا ہے)اپنے ہندو شناخت کے انکار کی زبردست تحریک چل رہی ہے۔ہم نے اس ملک کے قدیم باشندوں کے اصل مذہب کی تاریخ ہی نہیں پڑھی، ہرگز وہ ہندو نہیں تھے، اسی طرح قبائلی لوگ (Tribals) جو بہت بڑی تعداد میں اس ملک میں آباد ہیں کیا وہ ہندو ہیں؟ ہرگز نہیں! تو ہندوؤں کی اکثریت کہاں سے ہوگئی؟ ہم نے جو اپنی حکمت عملی بنائی تھی وہ اس بنیاد پر تھی کہ ہم اقلیت میں ہیں اور ہندو اکثریت میں ہیں، میرا کہنا ہے کہ اس بنیادی بات اور اس پر مبنی حکمت عملی پر نظر ثانی کا وقت آ گیا ہے۔

① ایک اور ② قومی نظریہ کی بحث نے حقیقت پہ پردہ ڈال دیا

اُس وقت حالات کے تجزیہ کا وقت نہیں تھا، اس وقت تو یہ مسلمہ بات تھی، اور مسلمہ بات چلا چلا کر اتنے یقین سے کہی گئی تھی کہ سب نے اس پر یقین کیا اور وہ کیوں کہی گئی؟ اور بھارت کے لوگوں کو ہندو مسلم دو خانوں میں تقسیم کرنے کا رواج کب سے شروع ہوا تھا؟ یہ بھی بڑا دلچسپ ہے، بہت بڑے پیمانے پر دو قوم، دو قوم ایک قوم، ایک قوم کہا گیا تو وہ گروہ اٹھا جس نے دو قومی نظریہ قبول کیا، اور دوسرا گروہ اٹھا جس نے دو قومی نظریہ مسترد کردیا، عجیب بات ہے کہ ملک کی آزادی سے پہلے ایسی نظریاتی دھارائیں بہیں کہ ایک گروہ نے یہ کہا کہ ‌‌"بھئی مسلمان اور ہندو دو الگ لگ قومیں ہیں یہ کبھی ایک ساتھ نہیں رہ سکتیں، مسلمانوں کے لیے الگ ملک ہونا چاہیے ‌‌" یہ ایک تحریک اٹھی اور اسی کے نتیجے میں پاکستان بنا، دوسری طرف یہ تحریک اٹھی جس نے یہ کہا کہ ‌‌"ہم سب ایک قوم ہیں، یہ دو قومی نظریہ غلط ہے، قومیں وطن سے بنتی ہیں، قومیں مذہب سے نہیں بنتیں لہذا ہم سب ایک قوم ہیں ‌‌" ‌‌دو قومی نظریے کو قبول کرنے والے بھی ہمارے ہی لوگو میں موجود تھے اور مسترد کرنے والے بھی ہمارے ہی لوگوں میں موجود تھے، لیکن بلاشبہ اس بحث میں ہماری نگاہوں سے مخفی رہ گئی یہ حقیقت کہ اس ملک میں دو قومیں نہیں چھ ہزار قومیں بستی ہیں، ان چھ ہزار قوموں میں سے پانچ ہزار نو سو ننانوے قوموں کو نہایت چالاکی کے ساتھ ایک بنا دیا گیا اور اسے ہندو نام دے دیا گیا۔جن لوگوں نے دو قومی نظریہ تسلیم کیا اور جنہوں نے مسترد کیا در اصل وہ دونوں ایک دوسری سازش کا شکار ہو گئے، اور انہیں اس بات کا خیال ہی نہیں ہوا کہ جسے ہندو کہ کر ایک قوم مانا جا رہا ہے وہ ایک قوم نہیں، پانچ ہزار سے زیادہ قوموں اور قبائل کا ایک مجموعہ ہے۔

فسادات کی اصل وجہ

جب ان قوموں کے اندر یہ تحریک اٹھی اور بڑے زور سے اٹھی اور آپ کے مہاراشٹر سے ہی اٹھی کہ بھئی اپنی اصل پہچان کو سمجھو! تم ہندو نہیں ہو، تم کو زبردستی ہندو بنایا گیا ہے، اور جب ان کے اندر اپنی نسلی، قبائلی اور ذات برادری کی شناخت کا شعور پیدا ہونے لگا تو وہ جنہوں نے ان سب کو ایک قوم بنا دیا تھا بہت ڈر گئے کہ اگر یہ بیداری ان قوموں میں پھیل گئی تو جو ہم ہزاروں سال سے ان کو اپنا غلام بنائے ہوئے ہیں یہ غلامی ختم ہو جائے گی، چنانچہ انہوں نے اس وقت ایک زبردست قسم کی تحریک چلا کر ان سب کو ایک قوم اور اپنا غلام بنائے رکھنے کے مقصد سے مسلمانوں سے لڑا دیا، پھر جب ان قوموں نے یہ محسوس کیا کہ ہمارا دشمن مسلمان ہے تو وہ سب کے سب خود بخود ہندو بنتے چلے گئے۔تو مسلمانوں کو دشمن بنا کر پیش کرنا اسلیے ضروری تھا کہ اس کے بغیر وہ ہندو نہ بنتے، وہ او بی سی رہتے، شیڈول کاسٹ رہتے، شیڈول ٹرائب رہتے، لنگایت رہتے، قبائلی اور آدیواسی رہتے، ہندو نہ بنتے، ہندو بنانے کے لیے انہیں ایک دشمن دکھانا ضروری تھا، لہذا اصل قومی شناخت کو چھپانے کے لیے یہ تماشہ کیا گیا، اور اس کا شکار وہ بھی ہوئے، اور ہم بھی ہوئے، وہ بھی سمجھ گئے کہ وہ ہندو ہیں اور ہم نے بھی مان لیا کہ وہ ہندو ہیں، چنانچہ وہ جو بیداری کی لہر پھیلنا شروع ہوئی تھی وہ پھر دب گئی، اور یہ اسی کا نتیجہ ہے کہ آج ہم حالات کے اس رخ پر پہونچ گئے ہیں کہ ہمیں راستے بند نظر آ رہے ہیں، ایسا لگ رہا ہے کہ اب کوئی راستہ ہی نہیں ہے کیا کریں۔لیکن یقینی طور پر جب ایک راستہ بند ہوتا ہے تو دوسرے راستے ضرور کھلتے ہیں، یہ اللہ کا قانون ہے، تو ان راستوں پر غور کرنا، ان کے امکانات پر غور کرنا، نئی حکمت عملی تلاش کرنا اور اسے اختیار کرنا یہ زندہ قوموں کا فرض اور طرز عمل ہوتا ہے، جنگی حکمت عملیاں کبھی ایک سی نہیں رہتیں طارق بن زیاد کی جنگی حکمت عملی کچھ اور تھی، محمد الفاتح کی حکمت عملی کچھ اور تھی، امیر معاویہ کی بحری جنگی حکمت عملی کچھ اور تھی، ہمیشہ وقت کے قائد نے اس وقت کے حالات کے مطابق نئی جنگی حکمت عملی کو اپنایا ہے، ہم اس وقت اس مقام پر پہنچ گئے ہیں کہ یہ بات بالکل یقین کے ساتھ کہی اور سمجھی جا سکتی ہے کہ ہم نے اپنی حکمت عملی کی جو پہلی بنیاد قائم کی تھی اس پر نظر ثانی اب نہایت ضروری ہو گئی ہے۔یہ سوچنا کہ وہ اکثریت میں ہیں اور ہم اقلیت میں ہیں بالکل غلط ہے، بات الٹی ہے، اس ملک میں مظلوموں کی اکثریت ہے اور ظالموں کی اقلیت ہے، اب سیکولر اور فرقہ پرست کہنے سے کام نہیں چلے گا، چلنا ہوتا تو اب تک چل چکا ہوتا بہت عرصہ ہو گیا، یہ تو وہ تقسیم ہے جس کے ذریعہ سے حقیقی تقسیم کو چھپا دیا گیا، کیوں کہ جب ہم سیکولر اور فرقہ پرست کی تقسیم کو قبول کرتے ہیں تو اس سے پہلے ہم یہ مان لیتے ہیں کہ یہ سب ہندو ہیں، البتہ یہ سیکولر ہندو ہیں اور یہ فرقہ پرست ہندو ہیں، حالانکہ سرے سے یہ بنیاد ہی غلط ہے کہ یہ سب ہندو ہیں۔

ملک کی تاریخ کا نیا موڑ ‌‌"ہم ہندو نہیں ہیں ‌‌" 

اور عجیب بات ہے اللہ تعالی کا نظام دیکھیں، اس کی تکوینی قدرت اور منصوبہ بندی پر غور کریں کہ جس وقت اس پرانی حکمت عملی کے نا کام ہونے کا راز فاش ہو رہا ہے، اسی وقت ان قوموں میں جن کو ایک ‌‌"ہندو ‌‌"نامی قوم میں ضم کردیا گیا تھا، ان کی حقیقی شناخت اور پہچان بتانے کی تحریکیں خود ان کے اندر سے بڑے زور و شور سے کھڑی ہو چکی ہیں۔اسی لیے میں عرض کرتا ہوں کہ یہ ہماری تاریخ کا بہت اہم موڑ ہے۔اگر تنہا مسلمان ان کو یہ بتانے نکلتا کہ تم ہندو نہیں ہو تو اول تو بتا ہی نہیں سکتا تھا، اتنی کم ہمتی مسلمانوں میں آ گئی ہے کہ پوری سچائی بولنے والا دیکھنے کو آنکھیں ترستی ہیں، اور اگر کوئی کھڑا بھی ہوتا تو اس کی بات کا فائدہ کم اور نقصان زیادہ ہوتا، اگر صرف مسلمان کہتا تو اس قوم کے لوگ سنتے ہی نہیں بلکہ اس کا الٹا رد عمل ہو سکتا تھا، کیا اس کو آپ اللہ کے تکوینی نظام کے علاوہ اور کچھ سمجھ سکتے ہیں کہ انہی قوموں کے اندر بہت عرصہ پہلے قائدین اٹھ چکے ہیں اور بڑے زوردار انداز سے اپنی اپنی قوم کو آگاہ کر رہے ہیں کہ تم ہندو نہیں ہو، اور میں پچھلے کئی سالوں سے اس کا مشاہدہ کر رہا ہوں اور میں پوری ذمہ داری سے کہتا ہوں کہ وہ لوگ جو اپنے کو ہندو مانتے چلے آ رہے تھے، جو پوجا پاٹ، تیوہار اور کیرتن میں لگے ہوئے تھے، اور خوب برہمنوں کو دان دے رہے تھے، اور اپنے پیسوں سے مندروں کا کاروبار چلوا رہے تھے، اور مسلمانوں کے ساتھ خون ریز فسادات میں بڑھ چڑھ کر حصہ لیتے تھے انہی قوموں کے اندر اگر میں احتیاط سے کہوں کہ کم سے کم روزانہ ایک ہزار لوگ پورے ملک کے طول و عرض میں مجموعی طور پر اس بات کو قبول کر لیتے ہیں کے ہاں ہم ہندو نہیں ہیں، تو غلط نہ ہوگا اور یہ بھی احتیاط سے کہ رہا ہوں، ان میں کئی جن سے میرے اچھے رابطے ہیں یہ چاہتے ہیں کہ مسلمان کم از کم اب اس بات کو جان لیں کہ وہ ہندو نہیں ہیں، انہیں اس بات سے بہت غصہ آنے لگا ہے کہ مسلمان انہیں اب بھی ہندو سمجھتے ہیں، وہ کہتے ہیں کہ آپ ہمیں ماں بہن کی گالی دیدو ہمیں ہندو نہ کہو، ان کو تو ہمارے اور آپ کے منہ سے ‌‌"ہندوستان ‌‌"کا لفظ سننا برداشت نہیں ہے، ہم لوگ تو زیادہ تر ہندوستان ہی بولتے ہیں، عجیب بات ہے، اب تک مسلمان ہندوستان بولتے تھے اور وہ لوگ ‌‌‌‌" بھارت‌‌" ‌‌بولتے تھے، لیکن آپ نے اس بات پر غور کیوں نہیں کیا جب سے یہ نئی سرکار آئی ہے ہمارا وزیر اعظم بھولے سے بھی بھارت نہیں کہتا ہندوستان کہتا ہے ‌‌"واؤ ‌‌" مجہول بھی نہیں کہتا ہندوُستان (واو معروف کے ساتھ) کہتا ہے اور نیت یہ ہوتی ہے کہ یہ ملک ہندوؤں کا ہے، اس سے پہلے وہ لوگ بھارت بولا کرتے تھے اور مسلمان ہندوستان بولتا تھا، یہ بہت چونکانے والی بات ہے، اسی لیے امبیڈکر کو اس بات پر شدید اصرار تھا کہ دستور میں india کے لیے ہندی لفظ بھارت استعمال ہوگا، ہندوستان لفظ استعمال نہیں ہوگا۔

تو یہ تاریخ کا ایسا موقع ہے کہ اسی قوم کے اندر سے تحریکیں اٹھ رہی ہیں، میں کسی ایک تحریک کی طرف اشارہ نہیں کر رہا ہوں، اس قوم کی جو مختلف قبائلی اکائیاں ہیں ان کے اندر سے یہ تحریکیں اٹھ رہی ہیں، آدیواسیوں سے میرے اچھے تعلقات ہیں برابر ان سے رابطے میں رہتا ہوں، ان کے اندر اس وقت تیزی سے یہ تحریک پھیل رہی ہے کہ ہم ہندو نہیں ہیں، وہ جلوس نکال رہے ہیں جلسے کر رہے ہیں، دھرنے دے رہے ہیں، مورتیاں نکال نکال کر گھروں سے پھینک رہے ہیں، میڈیا یہ خبر لاتا ہے اور نہ کبھی لائے گا، میڈیا تو بنا ہی اس لیے ہے کہ وہ اصلی صورت حال سے واقفیت پھیلنے نہ دے، یہی اس کا مقصد ہے، لیکن جو ملک میں چل پھر کر دیکھتے ہیں وہ دیکھ رہے ہیں کہ ملک میں کیا ہو رہا ہے، میں پہلے بھی لنگایتوں سے ملا ہوں، آج سے بیس پچیس سال پہلے گلبرگہ میں لنگایت کے بڑے اپا سوامی سے ملاقات ہوئی تھی تو میں نے اپنی ٹوٹی پھوٹی معلومات کی روشنی میں کچھ کہنا چاہا اور ان سے کہا کہ سوامی جی میں نے بسو یشور ناتھ کی نظموں اور ونچوں میں جو کچھ پڑھا ہے جو در اصل آپ کا صحیفہ ہے،اس میں سرے سے ویدک دھرم اور مورتی پوجا کو نکارا گیا ہے اور سخت تردید خی گئی ہے،تو انہوں نے اس موضوع کو اہمیت نہیں دی بلکہ نظر انداز کردی،وہ نہیں چاہتے تھے کہ اس موضوع پر کسی مسلمان سے بات کریں،اور آج حالت یہ ہے کہ لنگایتوں کے لاکھوں کے جلوس نکل رہے ہیں،ریلیاں ہو رہی ہیں،جلسے ہو رہے ہیں اور وہ چلا چلا کر کہ رہے ہیں کہ ہم ہندو نہیں ہیں-اسی طرح آپ نے سکھ مذہب کے بارے میں پڑھا ہوگا اورنگزیب کا جو رشتہ احمدنگر اور اس خطے سے ہے،اس حوالے سے آپ کو تو ضرور پڑھنا چاہیے کہ اورنگزیب کون تھے اور ان کے سکھوں سے کیسے تعلقات تھے،گرونانک کون شخصیت تھی،سکھ مذہب کی کیا حقیقت ہے؟اگر کسی اور پر اعتبار نہیں تو کم از کم گرونانک کے بارے میں حضرت مولانا رشید احمد گنگوہیؒ کے خیالات ہی پڑھ لیجیے جو تذکرة الرشید میں ان کے سوانح نگار نے ذکر کیے ہیں کہ وہ ان کو کس نظر سے دیکھتے تھے؟ لیکن سکھوں کو بھی ہندو قرار دے دیا گیا، بلکہ اس قدر زیادتی ہوئی کہ آئین ہند کی دفعہ ۲۵، سیکشن B/2 کی تشریح کے طور پر خود دستور میں یہ لکھ دیا گیا کہ: فقرہ ⑵ کے ذیلی فقرہ (B) میں ہندوؤں کے حوالے کی یہ تعبیر کی جائے گی کہ اس میں سکھ جین، یا بدھ مذہب کے پیروں کا حوالہ شامل ہے: ۔سمجھنے کی کوشش کیجیے کہ سکھوں، جینیوں، اور بڈھستوں کے بارے میں دستور میں کیوں لکھنا پڑا کہ یہ بھی ہندو ہی شمار ہوں گے؟؟؟

میری معروضات کا خلاصہ یہ ہے کہ اب ملک کی تاریخ میں ایک بہت اہم موڑ آ گیا ہے، اور ایسے امکانات پیدا ہو گئے ہیں جن کا تصور مشکل تھا، اور ایسے خطرات بھی ہے کہ اگر ہم نے صورت حال کو صحیح طور پر نہ پڑھا، اور پرانی روش پر یہی کہتے ہوئے چلتے رہے کہ بل وجدنا آباءنا كذلك يفعلون. الشعراء. ۔یعنی ہم نے اپنے باپ دادا کو یہی کرتے پایا ہے تو یہ وفاداری نہیں ہے، یہ ذمہ داری کا صحیح احساس نہیں ہے، ہمیں بدلے ہوئے حالات میں اپنی حکمت عملی پر نظر ثانی برابر جاری رکھنی پڑے گی، اور ہم کو اپنا یہ مزاج بنانا پڑے گا کہ ہم اپنی غلطیوں سے سبق سیکھیں، مایوس نہ ہوں، اس مرحلے کو دور رکھنے اور نہ آنے دینے کی اس مخصوص اقلیت نے ہزاروں سال سے کوشش کی ہے، تا ہم ایسا لگتا ہے کہ اب ان کی کوشش کامیاب ہونے والی نہیں ہے، کیوں کہ ایسے اسٹیج پر بات پہونچ گئی ہے کہ مجھے نہیں لگتا کہ اب یہ آواز دب پائے گی، جگہ جگہ پریشانیاں تو آئیں گی، رکاوٹیں تو ڈالی جائیں گی، لیکن جس پیمانے پر اس وقت بات چل رہی ہے، قبائلی لوگوں میں، شمال مشرق کے لوگوں میں، آدیواسیوں میں، سکھوں میں، لنگایتوں میں، ایس سی ایس ٹی، یہاں تک کہ او بی سی میں جن کی آبادی ۵۲ فیصد ہے، ان سب کے اندر اس وقت اچھی خاصی لہر چل رہی ہے، اور اسی لہر کو روکنے کے لیے اس اقلیت کے مدبر دماغوں نے اپنی طاقت و توجہ کا ۷۰ /۸۰ فیصد حصہ او بی سی سماج پر لگا رکھا ہے، میں پوری ذمہ داری کے ساتھ اطلاع دیتا ہوں کہ نوبت اب یہاں تک پہنچ چکی ہے کہ جب ان قوموں کے افراد مسلمان کی زبان سے سنتے ہیں بھائی آپ ہندو نہیں ہو تو انہیں برا لگنے کے بجائے ان کا جوش، حوصلہ اور ہم سے ان کی محبت ہزاروں گنا بڑھ جاتی ہے۔

بھولے پن کو دور کیجیے! 

جانیے اور سمجھیے کہ اکثریت اصل میں ان ہی قوموں کی ہے ورنہ اس ظالم طبقہ کی تو صرف ساڑھے تین فیصد آبادی ہے، اور اس کے تمام حامیوں کا زیادہ سے زیادہ تناسب پندرہ فیصد ہے۔لیکن اس کی چالاکیاں ہیں اور ہمارا بھولا پن ہے!! ہمارے بھولے پن کا تو حال یہ ہے کہ ہمارے جلسوں میں کوئی نیتا اگر ٹوپی لگا کر آ گیا تو ہمارا دل چاہتا ہے کہ مصافحہ تو کر ہی لیں کہ کچھ برکت مل جائے گی اور اگر اس نے ‌‌"سلام الیکم ‌‌" ‌کہ دیا تو ہماری آنکھوں سے آنسو جاری ہو جاتے ہیں اور جی چاہتا ہے کہ اس سے بیعت ہو جائیں، ہم اس قدر بھولے ہیں، مسلمانوں کی ساری چالاکیاں آپس میں ایک دوسرے کے ساتھ ہیں، ایک دوسرے کی ٹانگ گھسیٹنا، اس پر الزام لگانا، اس کو بدنام کرنا، اس کا دل توڑنا، اس کی غیبت کرنا، بدگمانیاں کرنا اور ناکام کرنے کے منصوبے بنانا، یہ سب ہم آپس میں کرتے ہیں، لیکن جب دشمن یا اس کا کوئی ایجنٹ سامنے آتا ہے تو ہم اتنے بھولے اور مسکین بن جاتے ہیں کہ آؤ ہمیں لوٹ لو، ستر سال سے یہی ہو رہا ہے کہ سب بے وقوف بنا رہے ہیں اور وہ لوگ بھی یہ بات خوب جانتے ہیں کہ مسلمانوں سے بڑھ کر نادان کوئی قوم بھارت میں نہیں ہے، اس سے بڑھ کر بے وقوف، بے عقل، بے شعور، نا سمجھ بھولی اور سیدھی سادھی کوئی قوم نہیں ہے، اس کو دو جملے بول دو یہ لٹو ہو جاتی ہے، ہمارا حال یہ ہے کہ جس پر ہمیں بھروسہ کرنا چاہیے اس پر تو ہم شک کرتے ہیں، اور جس پر ایک سیکنڈ کے لیے اعتبار نہیں کرنا چاہیے اس پر بار بار اعتبار کرتے ہیں، یہی ہماری تاریخ ہے اب وقت آ گیا ہے کہ ہم اس طرز عمل کو بدل لیں! اور میری آپ سے صاف لفظوں میں گزارش ہے کہ آپ میری بات پر یقین نہ کریں آپ ان طبقات کے پاس خود جاکر دیکھیں، ان کے درمیان بیٹھ کر ان کے جلسوں میں شریک ہو کر دیکھیں کہ ان کے اندر کیا ہو رہا ہے، کیا خیالات پروان چڑھ رہے ہیں اور کیا منصوبے بن رہے ہیں، ان کے اندر کیسی بیداری و واقفیت پھیل رہی ہے کہ ہم پر ہزاروں سال سے کتنا ظلم ہوا ہے اور ہمیں ہندو بنا دیا گیا ہے حالانکہ ہم ہندو نہیں ہیں، اور اب وہ اسٹیج بھی آ گیا کہ مسلمان بھی ڈنکے کی چوٹ پر ان کے جلسوں میں شریک ہو کر ان کے پاس بیٹھ کر پوری قوت کےساتھ کہ سکتا ہے کہ بھائی آپ ہندو نہیں ہے۔

مسلمان کس بات کی سزا بھگت رہا ہے؟ 

میں پچھلے کئی سالوں سے ان کے جلسوں میں شریک ہو کر اس طرح کی باتیں کر رہا ہوں اور اس مضمون کو ان کے سامنے اس طرح بھی بیان کرتا ہوں کہ ہم مسلمان کس چیز کی سزا پا رہے ہیں؟ ہم صرف اس بات کہ سزا پا رہے ہیں کہ ہم نے آپ کی طرح ہندو بن جانا قبول نہیں کیا، ہمارا صرف یہی ایک جرم ہے باقی کوئی جرم نہیں ہے، آپ سب کے آباؤ اجداد نے اپنی جان بچانے کے لیے ہندو بن جانا قبول کر لیا، میں نے ان کی تاریخ پڑھی ہے، میں نے گپتوں کے دور کی تاریخ پڑھی ہے، میں نے اشوکا کے دور کی تاریخ پڑھی ہے، جب بدھسٹ تحریک یہاں پھیلی تھی تب کیا ہوا تھا؟ اس کے بعد شنکرا چاریہ کی تحریک نے کیا کیا؟ ایک طویل تاریخ ہے، بدھسٹوں کو لاکھوں کی تعداد میں جلایا اور مارا گیا تھا، زندہ جلانا یہ برہمن کی خاص الخاص پہچان ہے، وہ اپنے دشمن کو زندہ جلا کر خوش ہوتا ہے، اور ان کو باقاعدہ یہ بتایا جاتا ہے کہ جب تم کسی کو زندہ جلاؤگے تو فلاں دیوتا کی تم پر کرپا ہوگی، میں چلینج کے ساتھ کہ سکتا ہوں کہ یہ سب ان کے مذہب کا حصہ ہے، صرف مسلمانوں کو پہلی بار گجرات میں نہیں جلایا گیا، مسلمان یہی سمجھتے ہیں کہ بس ہمارے ساتھ یہ ظلم ہوا ہے، نہیں ان کو بالکل یہ نہیں معلوم کہ ڈھائی لاکھ بدھ بھکشوؤں (بدھسٹ علماء)کو زندہ جلایا گیا تھا، عوام الناس کا تو کوئی ذکر ہی نہیں، تو پھر بالاخر انہوں نے مجبور ہو کر کہا کہ ہماری جان بخش دو اس کے بدلے ہم سے جو چاہو کرنے کو تیار ہیں، ان سے کہا گیا کہ تم مورتی پوجا شروع کردو اس کے علاوہ ہمارا کوئی اعتراض نہیں ہے، چنانچہ بھارت میں اگر کسی کی سب سے بڑی مورتی ہے تو وہ اس گوتم بدھا کی ہے جس سے بڑھ کر مورتی پوجا کا مخالف اس دھرتی پر میری دانست میں کوئی پیدا ہی نہیں ہوا، علامہ حالی نے اپنی ایک مشہور نظم میں ہمارے اس ملک کو اکّال الامم کہا ہے، یہ وہی بات ہے جو میں کہ رہا ہوں کہ ہزاروں قوموں کواس نے نگل لیا، اگر ہمارے علماء نے مکاتب و مدارس کا جال نہ بچھایا ہوتا تو رب کعبہ کی قسم ہمارا تشخص اندلس کی طرح ختم ہو چکا ہوتا، وہ اندلس جہاں سینکڑوں علماء و محدثین، فقہاء اور علم کلام کے ماہرین، مختلف مکاتب فکر کے بانی، عظیم سائنسداں اور بڑے بڑے مشائخ و اہل اللہ پیدا ہوئے اس اندلس کا یہ حال ہو گیا کہ وہاں سینکڑوں کلومیٹر کے رقبے میں کوئی کلمہ پڑھنے والا نہیں ملتا، یہی حشر ہمارے اس ملک کا ہوتا اور یہی منصوبہ تھا ابلیس اور اس کے لاؤ لشکر کا مگر۔۔۔۔۔۔

یہ چمن معمور ہوگا نغمہ توحید سے

کسی کا کچھ بھی منصوبہ رہا ہو اللہ کا منصوبہ سر زمین ہند کے بارے میں کچھ اور ہے، و مكروا ومكر الله. و الله خير المكرين.، علامہ اقبال نے اس منصوبے کی جھلکیاں روحانی دنیا میں اپنی روحانی آنکھوں سے دیکھی تھیں، بڑے بڑے عارفین نے کہا ہے کہ اقبال صاحب مقام تھے، سر زمین ہند کے بارے میں جو اللہ کا منصوبہ ہے ان کے بعض اشعار سے اندازہ ہوتا ہے کہ اس کی کچھ جھلکیاں اللہ نے انہیں دکھا دی تھیں، وہ اشعار یہ ہیں: 

آسماں ہوگا سحر کے نور سے آئین پوش

اور ظلمت رات کی سیماب پا ہو جائے گی

آ ملیں گے سینہ چاکان چمن سے سینہ چاک

بزم گل کی ہم نفس باد صبا ہو جائے گی

آنکھ جو کچھ دیکھتی ہے لب پے آ سکتا نہیں

محو حیرت ہوں دنیا کیا سے کیا ہو جائے گی

شب گریزاں ہوگی آخر جلوہؑ خورشید سے

یہ چمن معمور ہوگا نغمہؑ توحید سے

یہاں کے بارے میں اللہ کا منصوبہ کچھ اور ہے، یہاں اسلام نہیں مٹے گا، یہیں سے اسلام کی زبردست نشاة ثانیہ ہوگی، اگر یہ اللہ کا منصوبہ نہ ہوتا تو الف ثانی کا مجدد سرزمین ہند میں نہ بھیجا گیا ہوتا، اور اب مجھے لگتا ہے اللہ کے اس منصوبے کی تکمیل کی طرف ہم تیزی سے آگے بڑھ رہے ہیں، دیکھنے میں تو یہ لگ رہا ہے رات کا اندھیرا بڑھ رہا ہے لیکن حقیقت میں صبح کی روشنی قریب ہو رہی ہے، لیکن اس کا دار و مدار اس پر ہے کہ ہماری نیتیں خالص ہوں، ہم اپنے ذاتی مفاد کو بالکل بالائے طاق رکھ دیں، ہمارا صرف ایک ہی مقصد ہو کہ میرا اللہ مجھ سے راضی ہو جائے، میری مغفرت کردے، مجھے نجات عطا فرمادے، صرف اسی نیت کے ساتھ اور حالات کے صحیح تجزیے اور نئی حکمت عملی کے مطابق ہم مشترکہ اجتماعی جد و جہد میں اپنی جان و مال، صلاحیتیں اور وقت لگانا شروع کریں تو ہم اس مستقبل کی طرف تیزی سے بڑھیں گے، جس کی طرف میں نے ابھی اشارہ کیا، اور بظاہر اس کے راستے اب کھل چکے ہیں۔

میری معروضات کا حاصل یہ ہے کہ اس ملک کا اصل مسئلہ ہرگز ہندو مسلم نہیں ہے، ہندو مسلم بنایا گیا ہے اصل مسئلہ کو چھپانے کے لیے، اصل مسئلہ ظالم و مظلوم اور اونچ نیچ کا ہے جب تک ہم ہندو مسلم کی بنیاد پر اس ملک میں کوششیں کرتے رہینگے دشمن کو فائدہ اور ہمیں نقصان پہنچتا رہے گا یہ راستہ اتنا آسان نہیں تھا، لیکن اللہ نے پچھلے دس پندرہ سال میں اس آواز کو ایسا پھیلایا ہے کہ میں آپ کو کیا تفصیلات بتاؤں، میں کثرت سے سفر کرتا ہوں، جگہ جگہ ایسا ہوتا ہے کہ ٹرین میں یا ایئرپورٹ پر غیر مسلم دوڑتا ہوا آتا ہے، اور پوچھتا ہے آپ نعمانی صاحب ہیں؟؟ اس کے بعد وہ کہنا شروع کرتا ہے بلکہ عورتیں آکر کہتی ہیں نوجوان بچیاں آکر پیر چھونے کی کوشش کرتی ہیں اور کہتی ہیں نعمانی صاحب آپ کو دور دور سے دیکھ رہے تھے اتنا قریب سے دیکھا ہے، آپ سے بس یہ گزارش ہے کہ آپ نے ہم مظلوموں اور پچھڑوں کے سر پر جو ہاتھ رکھا ہے اب اس ہاتھ کو اٹھائیے گا مت ہم پندرہ بیس سال کا وقت مانگتے ہیں، ہم بھارت کا نقشہ پلٹ کر دکھائیں گے، عجیب صورت حال اور عجیب جوش ہے ان کے اندر اور یہ بھی خاص بات ہے کہ وہ خود اپنے منہ سے کہ رہے ہیں کہ جب تک مسلمان ہمارا پورا ساتھ نہیں دیں گے ہم کامیاب نہیں ہوں گے، ابھی پچھلے مہینے اکتوبر میں جھارکھنڈ میں آدیواسیوں کی بہت بڑی ریلی میں تھا، صرف اٹھارہ منٹ کی میری وہاں گفتگو ہوئی، اور اس کے بعد یہ حال ہوا کہ لوگوں کی عجیب کیفیت ہو گئ، لوگ رونے لگے، میرا وہاں سے نکلنا مشکل ہو گیا، یہاں تک کہ ان میں سے ایک خاتون اسٹیج پر آئیں اور انہوں نے منتظمین سے ضد کی کہ دو منٹ بولنے دیجیے! حالانکہ جلسہ ختم ہو چکا تھا، انہوں نے مائیک پر آ کے صرف اتنا کہا کہ میں پینتیس سال سے آدیواسیوں کی پہچان اور تشخص کے لیے محنت کر رہی ہوں آج میں نے نعمانی صاحب کی بات سنی ہے اور اس سے پہلے بھی میں جو سنتی رہی ہوں اس کے بعد میں مسلم بھائیوں اور بہنوں سے صرف اتنا کہنا چاہتی ہوں کہ آپ ہمارے سر پہ ہاتھ رکھ دیجیے ہم دو سال کے اندر جھارکھنڈ سے اس برہمن ووستھا (سسٹم) کو اکھاڑ پھینک دیں گے، زمینی سطح پر کئی علاقوں میں اس وقت یہ کیفیت ہے اور اسی لیے اس وقت گائے کے نام پر، لو جہاد کے نام پر اور فلاں فلاں تماشوں کے نام پر وہ چھوٹی سی اقلیت ان طبقات کی توجہ اپنی طرف موڑنا چاہتی ہے، اور ان کو ہندو بنائے رکھنا چاہتی ہے، جن کو ہندوئیت سے نکالنا تنہا ہمارے بس کی بات نہیں تھی، اللہ جس کو چاہے استعمال کر لے بہ تو اللہ کا کام ہے، کوئی سوچ ہی نہیں سکتا تھا کہ اسی قوم کے لوگ کھڑے ہو جائیں گے، پنجاب میں اس وقت جو لہر چل رہی ہے آپ دور بیٹھ کر اس کا اندازہ ہی نہیں کر سکتے کہ پنجاب کے سکھوں کا اس وقت کیا حال ہے؟ وہاں کیا ہو رہا ہے اور ان کی کیا کیفیت ہے؟ سکھ چلا چلا کر کہ رہے ہیں کہ ہم ہندو نہیں ہے اور ہم اب اس بات کو برداشت نہیں کریں گے کہ ہمیں ہندو کہا جائے۔

علماء کرام سے گزارش

تو بس میں اس وقت یہی بات کہنے آیا ہوں کہ ماضی کے تجربوں سے سبق سیکھتے ہوئے، مستقبل کے امکانات اور خطرات کو سامنے رکھتے ہوئے ہم کو پورے اخلاص کے ساتھ نئی حکمت عملی پر غور کرنا چاہیے، اور اس نئی حکمت عملی کا تقاضہ یہ بھی ہے کہ اسلام کو سمجھے ہوئے، بصیرت، شعور اور گہرا ایمان رکھنے والے جواں عمر علماء اور دانش مند حضرات کی قیادت میں مسلمانان ہند اس نئی حکمت عملی کو اپنائیں، کیونکہ پچھلی حکمت عملی میں بھی خطرات تھے، وہاں بھی علماء کی نگرانی نصیب رہی اس لیے مسلمان ضم ہونے سے بڑی حد تک بچ گئے اور اس نئی حکمت عملی میں بھی اگر علماء اور اہل اللہ اور اسلام کو مضبوطی کے ساتھ سمجھنے والے لوگوں کی قیادت اور نگرانی کے بغیر اگر ہم نے قوم کو نئی حکمت عملی کی تحریکوں کے حوالے کردیا تو ایک نئی قسم کی گمراہی میں ہم اپنی قوم کو ڈھکیل دیں گے، اس لیے علماء کی نگرانی ضروری ہے، ہمیں معلوم ہونا چاہیے کہ ہمارے حدود کیا ہیں، ہم انضمام کبھی نہیں کریں گے ہم اتحاد و اشتراک کے قائل ہیں انضمام کے نہیں، اور یہ جو احساس و شعور ہے کہ کس حد تک ہم ساتھ دیں گے اور کن حدود کے آگے ہم ایک انچ نہیں بڑھیں گے یہ بغیر علماء کی قیادت کے سنبھالا نہیں جا سکتا، جن چیزوں میں ہم متفق ہیں ان میں ہم ان شاء اللہ پورے خلوص و قوت کے ساتھ اور مشترکہ جد و جہد کرتے ہوئے آگے بڑھیں گے اور جن مسائل میں ہم متفق نہیں ہیں وہاں ہمارے راستے بالکل الگ ہوں گے، اس نئی حکمت عملی میں جہاں امکانات ہیں وہیں خطرات بھی ہیں، ایسا نہ ہو کہ مسلمان بھی وہی زبان بولنے لگے، قطعا نہیں ہمیں اپنے دین و شریعت اور تہذیب کے اندر رہتے ہوئے اور مقاصد کو سامنے رکھتے ہوئے بڑی حکمت، بڑے صبر و انتظار، بہت سلیقے اور بہت تحمل کے ساتھ، جلد بازی سے بچتے ہوئے آگے بڑھنا ہے۔

سیرت نبویﷺ ہماری حکمت عملی کے لیے اسوہ

حضورﷺ کی ایک بات کا ذکر کر کے میں اپنی بات کو ختم کروں گا کہ جزیرۃ عرب میں پچاسوں قبائل تھے اور ایک قبیلے کو چھوڑ کر وہ سب بت پرست قبیلے تھے، لیکن اتنی بات تو آپ جانتے ہیں کہ حضورﷺ نے ہر قبیلے سے الگ معاہدہ کرنے کی کوشش کی، حالانکہ بظاہر ان کا مذہب ایک تھا، لیکن نبوت کی اس حکمت عملی پر ذرا غور تو کریں، آپ نے انہیں مذہبی وحدت قرار نہیں دیا بلکہ آپ نے ان کی قبائلی شناخت کو ان کی اصل پہچان قرار دے کر قبیلوں کے لیڈروں سے معاہدے کیے، یہی اسوہ حسنہ ہمارے سامنے ہونا چاہیے، ہمیں ان سب کو ایک مذہبی وحدت قرار دینے کی کوشش اب چھوڑ دینی چاہیے، یاد رکھیں عربوں میں جس سماجی اکائی کو قبیلہ کہا جاتا تھا اسی کو بھارت میں ذات اور کاسٹ کہا جاتا ہے۔

مجھے امید ہے کہ اس مختصر وقت میں جو ضروری بات میں آپ سے کہنے کے لیے حاضر ہوا تھا وہ میں نے بڑی حد تک آپ سے کہ دی ہے، امید ہے کہ آپ بہت سنججیدگی سے غور بھی کریں گے اور اس کو گہرائی سے سمجھنے کے لیے آپ باقاعدہ وقت نکالیں گے۔جزاکم اللہ تعالی۔

و آخر دعوانا أن الحمد لله رب العلمين

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